Varn Vichar – वर्ण विचार | हिंदी व्याकरण

वर्ण विचारVarn Vichar : हिंदी व्याकरण के तीन भाग होते हैं – वर्ण विचार, शब्द विचार और वाक्य विचार।

Varn Vichar in Hindi

वर्ण (Letter)

वर्ण (Letter) : हिंदी शब्द “भाषा” संस्कृत के “भाष्” शब्द से बना हैं| भाष् का अर्थ हैं “बोलना”| भाषा की सार्थक इकाई “वाक्य” हैं| वाक्य से छोटी इकाई उपवाक्य, उपवाक्य से छोटी इकाई पदबंध, पदबंध से छोटी इकाई पद अर्थात शब्द, पद से छोटी इकाई अक्षर और अक्षर से छोटी इकाई ध्वनि या वर्ण (Letter) होती हैं| ध्वनि या वर्ण ही हिंदी भाषा की सबसे छोटी इकाई हैं|

Varn Vichar
Varn Vichar
 

काम शव्द 2 अक्षर (का और म) और 4 वर्ण (क्, आ, म् और अ) से मिलकर बना हैं| क्+आ= का और म्+अ=म का+म=काम

  • ध्वनि की वह सबसे छोटी इकाई जिसके और टुकड़े न किये जा सके, उसे वर्ण कहते हैं|
  • वर्ण उस ध्वनि को कहते हैं, जिसके और टुकड़े या खंड न किये जा सके|
  • वह छोटी से छोटी ध्वनि जिसके टुकड़े न हो सके, वर्ण कहलाती हैं|
  • हिंदी में कुल वर्णों की संख्या 52 हैं|
  • वर्ण- जैसे- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, क, ख आदि वर्ण हैं।

‘राम’ और ‘गया’ में चार-चार मूल ध्वनियाँ हैं, जिनके खंड नहीं किये जा सकते- र + आ + म + अ = राम, ग + अ + य + आ = गया। इन्हीं अखंड मूल ध्वनियों को वर्ण कहते हैं। हर वर्ण की अपनी लिपि होती है। लिपि को वर्ण-संकेत भी कहते हैं।

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वर्णमाला (Alphabet)

  • वर्णों के व्यवस्थित समूह या वर्णों के सार्थक समूह को वर्णमाला कहते हैं|
  • समस्त वर्णों के समूह को वर्णमाला कहते हैं|
  • वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं|
  • हिंदी वर्णमाला में 52 वर्ण हैं।
  • प्रत्येक भाषा की अपनी वर्णमाला होती है।

हिंदी वर्णमाला- अ, आ, क, ख, ग….. 

अंग्रेजी वर्णमाला – A, B, C, D, E….

वर्ण के भेद या प्रकार

वर्ण को दो प्रमुख भागों में बाटा गया हैं-

  • वर्ण को दो प्रमुख भागों में बाटा गया हैं- स्वर और व्वंजन|
  • हिंदी वर्णमाला में कुल 52 वर्ण होते हैं|
  • इन 52 वर्णों में 11 स्वर और 33 व्यंजन होते हैं|
  • 4 संयुक्त व्यंजन|
  • 2 उक्षिप्त/द्विगुण व्यंजन|
  • और 2 आयोगवाह होते हैं|
  • कुल 11+33+4+2+2=52 वर्ण होते हैं|

वर्ण के भेद या प्रकार-

  1. स्वर (Vowel)
  2. व्यंजन (Consonant)

स्वर (11)

1. ह्रस्व या लघु स्वर (4)- अ, इ, उ, ऋ
2. दीर्घ स्वर (7)- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ (ए, ऐ, ओ, औ को संयुक्त स्वर कहते हैं)
3. प्लुत स्वर- जैसे- ओऽम्

व्यंजन (33)

1. स्पर्श/वर्गीय व्यंजन (25)- क वर्ग से प वर्ग तक
2. अन्तस्थ व्यंजन (4)- य, र, ल, व
3. उष्म व्यंजन (4)- श, ष, स, ह

नोट- कुल 52 वर्ण में 11 स्वर और 33 व्यंजन के अलावा 8 अन्य वर्ण भी हैं (11+33+8=52)-

1. संयुक्त व्यंजन- क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
2. उत्क्षिप्त/द्विगुण व्यंजन- ड़, ढ
3. अयोगवाह- अं, अः

स्वर (Vowel)

◈ जिन वर्णों के उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता की आवश्यकता नहीं होती, उस वर्ण को स्वर कहते है।
◈ जिन वर्णों के उच्चारण में फेफ़ड़ों की वायु बिना रुके (अबाध गति से) मुख से निकल जाए, उन्हें स्वर कहते हैं।
◈ जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी अवरोध के होता हैं, उसे स्वर कहते हैं|
◈ हिंदी में स्वर वर्णों की संख्या 11 हैं|

स्वर का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से हैं-

◈ स्वर- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ॠ
◈ हृस्य/लघु स्वर- अ, इ, उ, ऋ
◈ दीर्घ स्वर- आ, ई, ऊ
◈ संयुक्त स्वर- ए, ऐ, ओ, औ

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स्वर के भेद

स्वर तीन प्रकार के होते हैं-

  1. हृस्य या लघु स्वर (Short Vowels)
  2. दीर्घ स्वर (Long Vowels)
  3. प्लुत स्वर (Longer Vowels)

1. हृस्य या लघु स्वर (Short Vowels)-

हृस्य स्वर मूल और एक मात्रिक स्वर होते हैं|
हृस्य स्वर की उत्पत्ति अन्य स्वरों से नहीं होती हैं|
जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है उन्हें ह्स्व स्वर कहते है।
हृस्य स्वरों की संख्या 4 होती हैं- अ, इ, उ, ऋ
‘ऋ’ की मात्रा (ृ) के रूप में लगाई जाती है तथा उच्चारण ‘रि’ की तरह होता है|

2. दीर्घ स्वर (Long Vowels)-

दीर्घ स्वर मूल स्वरों (हृस्य स्वर) से मिलकर बनते हैं|
दीर्घ स्वर को द्विमात्रिक स्वर भी कहते हैं|
जिन स्वरों उच्चारण में अधिक समय लगता है, उसे दीर्घ स्वर कहते है।
जिन स्वरों उच्चारण में ह्रस्व स्वर से दोगुना समय लगता है, उसे दीर्घ स्वर कहते हैं।
दीर्घ स्वरों की संख्या 3 होती हैं- आ, ई, ऊ

3. प्लुत स्वर (Longer Vowels)-

जिन स्वरों उच्चारण में दीर्घ स्वर से भी अधिक समय लगता है, उसे प्लुत स्वर कहते हैं।
जिन स्वरों उच्चारण में ह्रस्व स्वर से तिगुना समय लगता है, उसे प्लुत स्वर कहते हैं।
प्लुत स्वरों के उच्चारण में तीन मात्राओं का समय लगता है|
प्लुत स्वर को त्रिमात्रिक स्वर भी कहते हैं|
प्लुत स्वर का चिह्न (ऽ) है।
प्लुत स्वर का प्रयोग अकसर पुकारते समय, नाटक एवं अभिनय कला में किया जाता है। जैसे- सुनोऽऽ, ओऽऽम्, हे कृष्णाऽ।
नोट- हिन्दी में साधारणतः प्लुत स्वर का प्रयोग नहीं होता। वैदिक भाषा में प्लुत स्वर का प्रयोग अधिक हुआ है।

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अनुनासिक, निरनुनासिक, अनुस्वार और विसर्ग

हिन्दी में स्वरों का उच्चारण अनुनासिक और निरनुनासिक होता हैं। अनुस्वार और विर्सग दोनों व्यंजन हैं, जो स्वर के बाद और स्वर से स्वतंत्र होते हैं। इनके संकेत चिह्न इस प्रकार हैं-

अनुनासिक (ँ) (Semi Nasal)- जिन ध्वनियों (स्वरों) का उच्चारण नाक और मुँह दोनों से होता है और उच्चारण में लघुता रहती है, उसे अनुनासिक कहते हैं| जैसे- चाँद, गाँव, दाँत, आँगन, साँचा आदि।

अनुस्वार (ं) (Nasal)- जिन ध्वनियों का उच्चारण केवल नाक से होता है, उसे अनुस्वार कहते हैं| जैसे- अंगूर, गंगा, गंदा, संगत, अंगद आदि। अनुस्वार स्वर के बाद आने वाला व्यंजन है|

निरनुनासिक– जिन ध्वनियों (स्वरों) का उच्चारण केवल मुह से होता है, उसे निरनुनासिक कहते हैं| जैसे- आप, अपना, इधर, उधर, घर आदि।

विसर्ग(ः) (Colon)- अनुस्वार की तरह विसर्ग भी स्वर के बाद आने वाला व्यंजन है| विसर् का उच्चारण ‘ह’ की तरह होता है। संस्कृत में इसका काफी व्यवहार है। हिन्दी में अब इसका अभाव होता जा रहा है; किन्तु तत्सम शब्दों के प्रयोग में इसका आज भी उपयोग होता है। जैसे- मनःदशा, मनःकामना, पयःपान, अतः, स्वतः, दुःख आदि।

नोट- अं, अः अयोगवाह कहलाते हैं। वर्णमाला में इनका स्थान स्वरों के बाद और व्यंजनों से पहले होता है। अं को अनुस्वार तथा अः को विसर्ग कहा जाता है। अनुस्वार और विसर्ग न तो स्वर हैं, न व्यंजन; परन्तु ये स्वरों के सहारे चलते हैं। स्वर और व्यंजन दोनों में इनका उपयोग होता है।

स्वरों की मात्राएँ (Vowel Signs)

अ’ के अतिरिक्त शेष स्वर जब व्यंजनों के साथ प्रयुक्त किए जाते हैं तो उनकी मात्राएँ ही लगती हैं। ‘अ’ की मात्रा नहीं होती। अ से रहित व्यंजनों को हलंत लगाकर दिखाया जाता है। जैसे- क्, ख्, ग् आदि। ‘अ’ लगने पर हलंत का चिह्न हट जाता है। जैसे क् + अ=क, ख् + अ=ख आदि।

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